भारत की पांडुलिपि विरासत: ताड़पत्र पांडुलिपियाँ और ज्ञान भारतम् मिशन, Wisdom of India पर

भारत में छपाई पहुँचने से पहले ज्ञान हाथ से नकल किया जाता था: ताड़ के पत्तों, भोजपत्र, कपड़े और कागज़ पर, दर्जनों भाषाओं और लिपियों में।

अनुमान है कि भारत में ऐसी एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियाँ हैं। यह दुनिया में कहीं भी मौजूद हस्तलिखित ज्ञान का सबसे बड़ा भंडार है।

इनमें से अधिकांश की कभी सूची नहीं बनी, पढ़ा जाना तो दूर की बात है। ज्ञान भारतम् नामक एक सरकारी मिशन अब इन्हें खोजने, संरक्षित करने और डिजिटल रूप देने का प्रयास कर रहा है।

पांडुलिपि किसे माना जाता है

पांडुलिपि एक हस्तलिखित दस्तावेज़ है, आमतौर पर कम से कम 75 वर्ष पुराना, जिसका कोई वैज्ञानिक, ऐतिहासिक या साहित्यिक महत्व हो। यह छपी हुई पुस्तक नहीं है, और न ही केवल कोई पुराना पत्र या अभिलेख।

भारत में ये उसी सामग्री पर लिखी गईं जो स्थानीय स्तर पर टिकती थी: दक्षिण और पूर्व में ताड़पत्र, कश्मीर में भोजपत्र, उत्तर और पश्चिम में हाथ से बना कागज़। कई को जिल्द में चिपकाने के बजाय लकड़ी के पटरों के बीच डोरी से बाँधा जाता था।

इनमें संस्कृत, तमिल, फ़ारसी, अरबी, प्राकृत, तेलुगु, ओड़िया और कई अन्य भाषाओं में लेखन है, और लिपियों में ग्रंथ, शारदा, मोड़ी और मैथिली शामिल हैं। एक ही संग्रह में कई ऐसी लिपियाँ हो सकती हैं जिन्हें आज जीवित बहुत कम लोग धाराप्रवाह पढ़ पाते हैं।

इनके भीतर क्या है

अक्सर मान लिया जाता है कि पांडुलिपियाँ धार्मिक ग्रंथ हैं। कई हैं भी, पर दायरा इससे कहीं अधिक विस्तृत है।

इनमें चिकित्सा और शल्यक्रिया, खगोल और गणित, व्याकरण और तर्कशास्त्र, विधि, स्थापत्य, संगीत, काव्य, कृषि और धातुकर्म पर ग्रंथ शामिल हैं, साथ ही पारिवारिक अभिलेख और स्थानीय इतिहास भी।

यही कारण है कि खोई हुई पांडुलिपि केवल एक खोई हुई प्रति नहीं होती। जहाँ किसी पाठ की केवल एक ही प्रति बची हो, वहाँ उसके साथ पाठ भी लुप्त हो जाता है।

ज्ञान भारतम् मिशन

ज्ञान भारतम् की घोषणा 2025–26 के केंद्रीय बजट (Union Budget) में भारत की पांडुलिपि विरासत के सर्वेक्षण, प्रलेखन, संरक्षण और डिजिटलीकरण के मिशन के रूप में हुई थी। इसे संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) चलाता है।

यह एक कहीं छोटे प्रयास की जगह लेता है। 2003 में स्थापित राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (National Mission for Manuscripts) का बजट ₹3.5 करोड़ से बढ़कर ₹60 करोड़ हो गया, और रिपोर्टों के अनुसार 2025 से 2031 तक मिशन का कुल परिव्यय ₹490 करोड़ से अधिक है।

इसका घोषित लक्ष्य पूरा अनुमानित संग्रह है: विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, संग्रहालयों, मठों, मंदिरों और निजी परिवारों के पास मौजूद एक करोड़ से अधिक पांडुलिपियाँ।

एक पोर्टल और एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण

सितंबर 2025 में, नई दिल्ली के विज्ञान भवन (Vigyan Bhawan) में पांडुलिपि विरासत पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के साथ, प्रधानमंत्री ने ज्ञान भारतम् पोर्टल का शुभारंभ किया, जो एक सार्वजनिक भंडार है जहाँ डिजिटल की गई पांडुलिपियाँ प्रकाशित होती हैं।

मार्च 2026 में संस्कृति मंत्रालय ने ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण शुरू किया, जिसका उद्देश्य जिलेवार पांडुलिपि संग्रहों की जियो-टैग की हुई सूची तैयार करना है।

यह सर्वेक्षण सुनने में जितना सामान्य लगता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। भारत की पांडुलिपियों का बड़ा हिस्सा निजी हाथों और छोटी संस्थाओं के पास है, और किसी के पास इसकी भरोसेमंद सूची नहीं है कि क्या मौजूद है और कहाँ है।

अब तक की प्रगति

फरवरी 2026 में सरकार ने संसद को बताया कि मिशन के तहत 7.5 लाख से अधिक पांडुलिपियाँ डिजिटल की जा चुकी हैं, जिनमें से लगभग 1.29 लाख पोर्टल पर उपलब्ध हैं, और 45 केंद्र जोड़े जा चुके हैं।

यह वास्तविक प्रगति है और साथ ही इस काम के पैमाने की याद भी। 7.5 लाख पांडुलिपियाँ भी अनुमानित एक करोड़ का छोटा-सा अंश हैं।

काम स्थानीय स्तर पर भी हो रहा है। राज्यों और जिलों ने अपने डिजिटलीकरण अभियान शुरू किए हैं, और कुछ ने स्कैन की गई सामग्री को छाँटने, अनुक्रमित करने और अनुवाद करने में मदद के लिए सॉफ़्टवेयर का उपयोग शुरू किया है।

कठिन हिस्सा स्कैनिंग नहीं है

पांडुलिपि की तस्वीर लेना इस पूरी शृंखला का सबसे आसान चरण है।

कठिनाइयाँ इसके दोनों ओर हैं:

  • उन्हें खोजना
  • भौतिक क्षय
  • दुर्लभ लिपियाँ
  • सूचीकरण
  • पठन और संपादन
  • अनुवाद

ताड़पत्र और कागज़ गर्मी और नमी में क्षय होते हैं, और बाकी काम कीड़े कर देते हैं। कुछ पांडुलिपियाँ इतनी भुरभुरी हैं कि खोली नहीं जा सकतीं, और किसी भी कैमरे से पहले संरक्षण करना पड़ता है।

स्कैन एक छवि है, पाठ नहीं। उसे खोजे जा सकने योग्य बनाने के लिए ऐसा व्यक्ति चाहिए जो लिपि पढ़ सके, कृति की पहचान कर सके और बता सके कि वह क्या है। शारदा और मोड़ी जैसी लिपियों के लिए ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है।

फिर आता है सबसे धीमा हिस्सा: संपादन और अनुवाद, जो सावधानीपूर्वक किया जाने वाला विद्वत्तापूर्ण काम है और हर पाठ पर वर्षों लेता है। डिजिटलीकरण इस काम को अधिक लोगों के लिए संभव बनाता है; यह काम स्वयं नहीं करता।

इसीलिए मिशन का ईमानदार वर्णन यह नहीं है कि "भारत एक करोड़ पाठों के ताले खोल रहा है"। सच यह है कि भारत पहली बार व्यवस्थित रूप से यह पता लगा रहा है कि उसके पास है क्या।

जिस पांडुलिपि को कोई पढ़ न सके, वह एक बंद दरवाज़ा है। स्कैन उस दरवाज़े की हूबहू नकल बना देता है। चाबी अब भी पाठक ही है।

स्रोत और आगे पढ़ें

टैग

  • पांडुलिपियाँ
  • ज्ञान भारतम्
  • भारतीय ज्ञान परंपरा
  • संस्कृत
  • ताड़पत्र पांडुलिपियाँ
  • डिजिटलीकरण
  • विरासत संरक्षण
  • संस्कृति मंत्रालय
  • भारतीय इतिहास
  • अभिलेखागार